Skip to main content

जिंदगी

जिंदगी कितनी बेपरवाह सी होती 
जो न जश्न हो , न आरजू 
न ख्वाइशें , न जुस्तजू 
न जिस्म को जिस्म से कोई शिकायत होती 
न कोई जहान की तलाश , न कोई जहन्नुम का खौफ 
न कोई जंग , न कोई काफिला 
न कोई हार जीत का सिलसिला 
बेफ़िक्र से चलते हम और तुम 
न आँखों में कोई दर्द होता 
न चेहरे पे कोई जख्म 
न कोई कसमकश का अफ़साना होता 
न कोई बुलंदियों के किस्से 
न कभी गिरते 
न कभी उठते 
सब चलते फिरते बुत होते 
जिंदगी की तलाश में ||

Comments

Post a Comment