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AMRITA PRITAM :A Diary Entry

"There was a grief I smoked
in silence, like a cigarette
only a few poems fell
out of the ash I flicked from it."

:Amrita pritam

The afternoon of october 31,2005, literature sensed the demise of an embodiment that was capturing the intensity of social dilemma, emotions of feminism and precisely the perpetual state of love making since time immemorial.

Those days I started nourishing my keen interest in hindi literature through translated works of this lady.  To be more qualitative behind the every craftsmanship that I started edging out with time , behind the reflection that my lines managed out of emotional and relational dictum there lies some inspiration .

Writings of Amrita Pritam were not like advises rather a demand redefining the norms and the social structure.
Today I erased my house number;
gifted the street plate
 to the long grown darkness.
And identity that defines
the road to my street
I immersed that to tidal waves.
Yet I have an answer
to your desperation to meet me.
Knock every gate of every street
ask if there lies a free spirit!
(translated by blogger)

One of the hindi poem published by bhartiya jnanpith intrigued me the most, as it takes on the the irony of society.


शहर
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है
सड़कें - बेतुकी दलीलों सी…
और गलियां इस तरह
जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता
कोई उधर.
......
..
जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?
फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता
बहस से निकलता, बहस में मिलता…
शंख घंटों के सांस सूखते
रात आती, फिर टपकती और चली जाती
पर नींद में भी बहस खतम न होती 
___________________________________________
And like this every lines quotes out 
"You who catch shadows!
The fire that burns in the heart
Has no shadow...
(epigram on her autobiography rasidi ticket).

And before I say good night I must mention my late night diary entry.
मेरी अमृता 

मेरी अमृता 
बाहर गिने चुने तारे 
आसमां को शक्ल देने की कोशिश कर रहे हैं |
गिने चुने शाखायें 
तेरे कैनवास पे उतरे लकीरों की तरह 
अँधेरे को रूह देने की ख्वाइश कर रहे हैं ||

दूर तक फैली ख़ामोशी से 
पूछता हूँ मैं कभी कभी ,
"तेरी अमृता से मुलाकात 
हुई है क्या कहीं ?"

जाने ये क्या है :शर्म है या हया है 
जाने कैसी बेरुखी है ,ख़ामोशी है 
टूटे नहीं टूटती है |

जाने क्यूँ चुप चुप सी है 
बातें करने से डरती है |
जाने क्यूँ इन चेहरों पे 
सिकन भी नहीं पड़ती है ||

मेरी अमृता 
उठो एक बार फिर से 
कहीं अपने लफ़्ज़ों में कह डालो 
"मैं तुम्हें फिर मिलूंगी
कहाँ? किस तरह? पता नहीं।
शायद तुम्हारी कल्पनाओं का चिह्न बनकर
तुम्हारे कैनवस पर उतरूंगी
फिर तुम्हारे कैनवस के ऊपर
एक रहस्यमयी लकीर बनकर
खामोश तुम्हें ताकती रहूँगी। 

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी
कहाँ? किस तरह? पता नहीं।"
______________________________________
Good night
Just keep busy living.






Comments

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