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Choice of hypothesis

A statistician was asked to test the hypothesis, H0: Terrorism has no religion. The statistician demarcates the concerned population size, draws a large sample space runs the t-test at 99.9 % confidence interval and hypothesis H0 gets rejected. As the population in this context, consists of terror driven demographics, this was inevitable.
The same statistician was asked again to test the hypothesis, H0: Religion has nothing to do with terrorism. The statistician demarcates the concerned population size, draws a large sample space runs the t-test at 99.9 % confidence interval and he fails to reject the hypothesis H0. As the population in this context, consists of typical social demographics independent of any inclination towards religion and sect, the statistician observed the same distribution of criminality over whole space. It had people from Syria, it had people from Mumbai, It had people from New York, It had people from Iraq  and hence inference was inevitable.
The point is there are two school of thoughts. Believers of "Terrorism has no religion" are actually testing the second hypothesis, while believers of "Terrorism do have a religion" are actually testing the first hypothesis.
So this debate is never between religion and terrorism, the debate is actually between choice of sample space, the debate is actually between choice of population, the debate is actually between choice of hypothesis.

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गुलज़ार और मैं: तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता

मोमिन ने अपने वक़्त में जब ये शेर दर्ज किया की " तुम मेरे पास होते हो  गोया जब  कोई दूसरा नहीं होता " तो ग़ालिब कह बैठे ; " मोमिन ये एक शेर मुझे दे दो , मेरी पूरी जमीनी ले लो " |
अलग अलग दौड़ के मजनुओं ने इस शेर को अलग अलग तरीके से अपनी मेहबूबा के लिए दोहराया है | मैं आज गुलज़ार के लिए दोहराता हूँ |

मुक्त दो चार लफ़्ज़ों में  एक पूरी जिंदगी समेट लेने की हैसियत रखनेवाले गुलज़ार जाने अनजाने हमारे और आपके पास हर उस लम्हे में होते हैं जब कोई दूसरा नहीं होता |

कभी कोई आपके कंधे पे हलके हथेलियों से मारता है , पूछता है " माचिस है ? , तो आप अनायास कह जाते हैं
" मैं सिगरेट तो नहीं पीता 
मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ 
 "माचिस है?" 
बहुत कुछ है जिसे मैं फूंक देना चाहता हूँ |"

यूँ ही कभी कोई आश्ना , आपसे पूछ बैठे जो "क्या भेजोगे इस बरस ? " तो भींगा सा एक ख्याल आता है
" गुलों को सुनना जरा तुम सदायें भेजी हैं / गुलों के हाथ बहुत सी दुआएं भेजी हैं
तुम्हारी खुश्क सी आँखें भली नहीं लगती / वो सारी यादें जो तुमको रुलायें भेजी हैं || "

जो कोई तन्हा…

AMRITA PRITAM :A Diary Entry

"There was a grief I smoked
in silence, like a cigarette
only a few poems fell
out of the ash I flicked from it."
:Amrita pritam

The afternoon of october 31,2005, literature sensed the demise of an embodiment that was capturing the intensity of social dilemma, emotions of feminism and precisely the perpetual state of love making since time immemorial.

Those days I started nourishing my keen interest in hindi literature through translated works of this lady.  To be more qualitative behind the every craftsmanship that I started edging out with time , behind the reflection that my lines managed out of emotional and relational dictum there lies some inspiration .

Writings of Amrita Pritam were not like advises rather a demand redefining the norms and the social structure.
Today I erased my house number;
gifted the street plate
 to the long grown darkness.
And identity that defines
the road to my street
I immersed that to tidal waves.
Yet I have an answer
to your desperation to meet …

मौत कोई कविता नहीं है |

पिछले एक महीने में आई आई टी  खड़गपुर से दो छात्रों के सुसाइड की खबर, खबर से कहीं  ज्यादा उस एक सत्य की तलाश भी है जिसे हम आपने अर्सों से झुठला रखा है | लेकिन हर बार घूम फिर के सारा दोष संस्थान पे फेक देना भी उतना ठीक नहीं है | कभी कभी ये भी जरुरी है की हम अपना आत्मविश्लेषण करें - आखिर क्या कमी रह गयी जो हम एक लम्हे भर के आक्रोश को रोक नहीं पाए | एक छात्र का निर्माण घर से शुरू होता है, कॉलोनी वाले , आस पड़ोस वाले उसके इंस्पिरेशन बनते हैं और कहीं न कहीं सफलता की परिभाषा भी उसी दौड़ में गढ़ी जाती है | स्कूल आपका स्तम्भ है, कॉलेज उसपे पताका बांधता है | ऐसे में हर बात पे आई आई टी को सारा दोष देना भी तो ठीक नहीं | एक छात्र की हार में जितना जिम्मेदार कॉलेज है उतना ही उसका पिता भी, उसका परिवार भी, उसका समाज भी, उसका स्कूल भी | क्योंकि इनसब ने मिलकर तय किया था सफल होना , बुलंदियों को छूना, और जीतना का एक फ़र्ज़ी डेफिनिशन |

मौत कोई कविता नहीं है | 

वो इस सदी का सबसे बेवक़ूफ़ शायर है
जिसने कह रखा है
"मौत तू एक कविता है |"
मौत कोई कविता नहीं है
कविता है - मौत के खिलाफ विद्रोह |
वो शायर मेरा हर …