Skip to main content

थोड़ी शरारत, थोड़ी रवादारी और वर्मा जी ...

सफ़र में इश्क़ घोलने के वास्ते 
इन लोगों ने अंत्याक्षरी का दौड़ सुरु कर दिया |
वो सारे बेकार गाने 
जिन्हें हम  "क्लास लेस " कह के 
ठुकरा दिया करते हैं पर्दों पे ;
इनके  मायने आज बदले बदले से लगने लगे थे 
जैसे किसी ने खूबसूरती का एक लेयर चढ़ा दिया हो ,
हर एक लफ्ज़ पे , हर एक लम्हों  पे ||
मैं अपनी गोद  में गुलज़ार को संभाले संभाले 
कभी  इन्हें  देखता रहा , कभी दौड़ती बसों को |
एक  दो गाने मैंने भी सजेस्ट  कर दिए;
खैर 
अच्छी लगी इनकी बेफिक्री , 
होनी चाहिए  ||

दौड़ती बसों का भी एक अपना सुरूर  था 
एक साजिश सी लगती है , 
सियासत में रवादारी का इनपुट लाया  जा रहा हो जैसे ;
कभी वो आगे हो जाते थे 
चीखते थे , चिल्लाते थे ;
कभी हम आगे हो जाते थे 
चीखते थे , चिल्लाते थे ;
उनकी चीख बैरीटोन सी लगती थी 
हमारी चीख एक मिली जुली श्रील सी लगती थी 
लड़कियां ज्यादा थी हमारे बसों में , शायद इसलिए ||

और भी बहुत कुछ जो छोटे छोटे लम्हों में
 बिखरे रहे बस की सीटों पर ;
खैर वर्मा जी की ख़ामोशी में सारे दफ़न होते चले गए |
अब हम उन्हें क्या समझाएं 
हम उनसे कितना मुहब्बत करते हैं !!

सफर को जीते जीते
 कुछ स्कूली पन्ने परत दर परत खुलने लगे थे |
आज कल कहाँ मिलते हैं ऐसे लम्हें;
मैंने दो चार चुरा के रख लिए हैं जेब में ;
दो चार कैद कर लिए हैं मेगा पिक्सल्स में ;
वक़्त को ठहराने की कोशिश जारी है ||

Comments

  1. Wastav ke isi lamhon ko shayad hum dohrana chahte hai magar jeevan ki raftar mein bas yeh lamhe hi reh jatein hai...Amar rehte hai to bas woh hasin ki leher, beefikri ki naav mein jaise chalte hi jain...!

    Shayad main bhi isi daur se gujar chuka hun, is befikri ke shore mein mann chanchal tha ki main bhi shamil ho jaun, magar fir muje ehsaas hua ki, yeh daur shamil hone ka nahi balki, shamil karna ka hai...!

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

गुलज़ार और मैं: तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता

मोमिन ने अपने वक़्त में जब ये शेर दर्ज किया की " तुम मेरे पास होते हो  गोया जब  कोई दूसरा नहीं होता " तो ग़ालिब कह बैठे ; " मोमिन ये एक शेर मुझे दे दो , मेरी पूरी जमीनी ले लो " |
अलग अलग दौड़ के मजनुओं ने इस शेर को अलग अलग तरीके से अपनी मेहबूबा के लिए दोहराया है | मैं आज गुलज़ार के लिए दोहराता हूँ |

मुक्त दो चार लफ़्ज़ों में  एक पूरी जिंदगी समेट लेने की हैसियत रखनेवाले गुलज़ार जाने अनजाने हमारे और आपके पास हर उस लम्हे में होते हैं जब कोई दूसरा नहीं होता |

कभी कोई आपके कंधे पे हलके हथेलियों से मारता है , पूछता है " माचिस है ? , तो आप अनायास कह जाते हैं
" मैं सिगरेट तो नहीं पीता 
मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ 
 "माचिस है?" 
बहुत कुछ है जिसे मैं फूंक देना चाहता हूँ |"

यूँ ही कभी कोई आश्ना , आपसे पूछ बैठे जो "क्या भेजोगे इस बरस ? " तो भींगा सा एक ख्याल आता है
" गुलों को सुनना जरा तुम सदायें भेजी हैं / गुलों के हाथ बहुत सी दुआएं भेजी हैं
तुम्हारी खुश्क सी आँखें भली नहीं लगती / वो सारी यादें जो तुमको रुलायें भेजी हैं || "

जो कोई तन्हा…

आवारगी

Hindi elocution 2015  P.S > script won team Bronze for RK .
कभीकभीऐसाएहसासहोताहैकीहमनेखुदअपनेहाथोंबुझादिएहैं , मुहब्बतोंकेदिएजलाके | हमसबकिसीनकिसीकतारकेहिस्सेहैं | हरतरफआवाजेंहैं , अज्ञातऔरबेनिशान , नाजानेकिसकोपुकाररहीहैं ? नाजानेकिसेबुलारहीहै ? लोगभागेजारहेहैं | येजोहमारीलेक्चर , टूटोरियल ,प्रैक्टिकलकीदुनियाहै ,येजो७.३०से५.३०बजेकीदिनचर्याहै : इसकसमकशऔरबेचैनीमें , हमारेछुटपनकीआवारगी , कहींनकहींदमतोड़तीनज़रआतीहै | मान्यवर आजमेरेचर्चाकाविषयहै "आवारगी " | मैंमानताहूँ , येविषयइससदनकेबनेबनायेसिलसिलेकोएकझटकेमेंतोड़देताहै , खैरयहीतोआवारगीहै | घबराइयेनहीं | आवाराकोईबुरा

AMRITA PRITAM :A Diary Entry

"There was a grief I smoked
in silence, like a cigarette
only a few poems fell
out of the ash I flicked from it."
:Amrita pritam

The afternoon of october 31,2005, literature sensed the demise of an embodiment that was capturing the intensity of social dilemma, emotions of feminism and precisely the perpetual state of love making since time immemorial.

Those days I started nourishing my keen interest in hindi literature through translated works of this lady.  To be more qualitative behind the every craftsmanship that I started edging out with time , behind the reflection that my lines managed out of emotional and relational dictum there lies some inspiration .

Writings of Amrita Pritam were not like advises rather a demand redefining the norms and the social structure.
Today I erased my house number;
gifted the street plate
 to the long grown darkness.
And identity that defines
the road to my street
I immersed that to tidal waves.
Yet I have an answer
to your desperation to meet …