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The original story : 2.ईला

The original story :1.ईला can be read here The original story -1


This story is a tribute to #InternationalWomen'sDay.
मुहल्ले के लोगों ने उसका नाम गोर्की रख दिया | अस्पताल से जैसे ही आयी ,देखने वालों का एक तांता सा लग गया | बड़े दिनों बाद अस्पताल से कोई बेटी आयी थी |
वक़्त ढलता गया और  गोर्की वक़्त के साथ डूबती गयी | सबकुछ ठीक  चल रहा था की अचानक एक दिन गोर्की ने कहा " मम्मी , मेरे सारे दोस्त कोचिंग जा रहे हैं , मुझे भी इंजीनियर बनना है , इतनी अच्छी तो मैथ्स है मेरी  " | गोर्की दसवीं पास  करने  से बस कुछ  कदम दूर थी ,और उसने पूरा मन बन लिया था दोस्तों के  साथ कोई अच्छी कोचिंग ज्वाइन करने का | 
मम्मी  उस वक़्त  तो कुछ नहीं बोली  ,खैर रात  को  डिनर  टेबल पे फिर से बात चली | गोर्की अपने तस्सबुर के कैनवास की अकेली मालिकिन थी | इतनी आसानी से अपने सपने को डूबने कैसे देती |गोर्की मम्मी की ख़ामोशी भांप चुकी थी फिर भी एक बार और पूछने में क्या जाता था | 

डिनर टेबल पे मम्मी खामोश ही रही खैर जाते जाते उन्होंने कहा " चलो तुम्हारी जिद है तो एक ट्यूटर आ जाया करेगा पढ़ाने ,वैसे भी तुम्हारी मैथ्स तो अच्छी है ही "|
दूर बैठी दादी अम्मा ने सियासती टोन में कहा " देख ईला , इतना जिद्द नहीं करते , अपने घर जायेगी  ब्याह करके फिर जितना मर्जी जिद्द करना |"
ऐसा पहली बार नहीं हुआ था | गोर्की अर्थात ईला को आदत थी इन सब चीज़ों की | पिछले हप्ते गोर्की को एक  ड्रेस पसंद आ गया था |मम्मी ने कहा था " अभी तुम्हारी उम्र नहीं है | अपने घर जायेगी फिर जो पसंद आये वो पहनना |" 
आखिर वो अपना घर कब आएगा ? यही सोचते सोचे गोर्की पूरी रात गुजार देती | कभी कभी आधी रात को अपने डायरी में दो चार नज़्म लिख जाती | उसके सारे नज़्म हकीकत और स्वप्न की बीच खींचती ईला की तस्वीर हुआ करती थी |
" मैं हर शाम 
अपनी बची खुची साँसों को समेटती हूँ |
सोचती हूँ  आखिर मेरा घर कब आएगा ? 
मेरी जमीं मेरा आसमान ,मेरे सितारे कब आयेंगे फलक पे ?
कब कोई मेरे बाहों में मेरे लम्हों को जियेगा ?
कब कोई मुसाफिर , मेरी आँखों  में झांकेगा ?
आखिर मेरा घर कब आएगा ?"
......................................................................................................................................

ऐसे ही दो चार दस लफ़्ज़ों से पूरी की पूरी डायरी  भरी पड़ी थी |आज तहखाने में पड़े अतीत के  सबूतों को टटोलते टटोलते , जब इस डायरी पे नज़र पड़ी , ईला के   अंदर की गोर्की याद आ गयी | इस गोर्की से ईला तक के  सफ़र में अच्छी मैथ्स से एक  पेशेवर राइटर होने का सफ़र साफ़ जाहिर था |
यही सब सोचते सोचते मैंने ईला को फ़ोन लगाया |
"रोबिन , अरे मेरा एक बुकलेट तुम्हारे घर पे रह गया ,वो स्लेब(slab) था ना ,इना के बैग पड़े थे जहाँ ,बस वहीँ पे ,आते वक़्त याद नहीं रहा "
"हाँ ,इसीलिए तो मैंने कॉल किया ,मुझे लगा कुछ काम का होगा , मिस्टर जर्नलिस्ट क्या कर रहे हैं ?" मैंने एक  पल में तस्वीर बदल दी बातों की  |
"खाना बना रहे हैं , शौक़ है उनका "
" ओहो , इतना प्यार ,क्या बात है ! " मैंने अपनी आवाज में थोड़ी और जान दी |
"प्यार ....रोबिन कुछ हकीकत प्यार से भी ऊपर होते हैं |ये घर मेरा नहीं रोबिन |मैं जब भी प्रशांत से कुछ मांगती हूँ कहता हैं : तुमने अपने घर से लाया ही क्या हैं ? मम्मी की याद आती हैं ; कहती थी जब अपने घर जाओगी ,तो ये करना ,वो करना , ये पहनना ,वो पहनना ..................   मेरी जिंदगी तो यही समझने में बीत जायेगी आखिर मेरा घर कौन सा है !!

कहते कहते ईला ने काफी कुछ कह  दिया , खैर तभी प्रशांत की आवाज आयी " अरे ईला ,देखो नमक ठीक तो है |"
मैंने डायरी के पहले पन्ने को फिर से खोला 
" मैं हर शाम 
अपनी बची खुची साँसों को समेटती हूँ |
सोचती हूँ  आखिर मेरा घर कब आएगा ? 
मेरी जमीं मेरा आसमान ,मेरे सितारे कब आयेंगे फलक पे ?
कब कोई मेरे बाहों में मेरे लम्हों को जियेगा ?
कब कोई मुसाफिर , मेरी आँखों  में झांकेगा ?
आखिर मेरा घर कब आएगा ?"

अरसों बाद एक  रात जागते जागते काट दिया मैंने ||

..............
Concept :Garima  Story :Anupam Kumar



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