कुछ यादें पल दो पल की सर्दी के रातों की तरह खिड़कियों से छन छन कर आती हुई | कुछ शौक से मुझमें मिलती हुई , कुछ शौक से मुझे मिलाती हुई कुछ शौक से मेरे दो चार शौक़ीन अदाओं को सिलती हुई , कुछ चेहरे पे केशुओं की तरह बेपरवाह सी खिलती हुई , कुछ सर्द हवाओं के रुख की तरह रास्ते बदलती हुई, कुछ दिसम्बर के सुबह की तरह साइकिल से दस्ताने हिलती हुई , कुछ गलियों के एक छोर से बेख़ौफ़ चिल्लाती हुई , कुछ यादें पल दो पल की सर्दी के रातों की तरह खिड़कियों से छन छन कर आती हुई | कुछ रातों को लकड़ियों के लपटों से जलाती हुई , कुछ गोदी में सुला कर सुकून और शराब पिलाती हुई , कुछ फूँक फूँक कर हथेलियों को गर्म हवा से भरती हुई , कुछ चुप्पी को सीने में समेटे बातें करने से डरती हुई , कुछ जिंदगी को हैरानी से टुक टुक सी ताकती हुई , कुछ रौशनदान के सुराखों से रौशनी की तरह झांकती हुई , कुछ मेरे लिखे लफ़्ज़ों को बेपरवाह गाती हुई , कुछ यादें पल दो पल ...