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आज कल लाश उगते नहीं ||

Poem is inspired from Sankha Aditya​'s "Who will apologise for these ? " फूटपाथ के किनारे किनारे अब और घास उगते नहीं || रिफाइनरी के आगोश वाला वो चाँद कितना स्याह पड़ गया है ; जुबान  खोलता है कुछ कहने को धुँआ भरा है  कंठ में अब और सांस उगते नहीं || याद है अहले सुबह बाँध  किनारे करचियां काटा करते थे ठिठुर गए हैं सारे कोंपले अब और बांस उगते नहीं || कितना कचरा खाता है आदमी पथ्थर बांधने की अब और जरुरत नहीं , फेंक दो किसी पास की बेंती में आज कल लाश उगते नहीं || करचियां =Thin bamboo culm ,used as tooth brush in villages .  बेंती = River stream आज कल लाश उगते नहीं  = with changing scenario and excessive use of pesticides and all , we are being fed with so much of useless craps , that if some one attempts a murder and throws the body in river , it won't float , it will sink . This is narrator's imaginative anger that challenges the notional science.

शहर

कभी कभी शहर को उन पंछियों के नज़र से भी देखना चाहिए , जो किसी मौसम या हालात में शहर आते हैं और फिर शाम होते ही घर को लौट जाते हैं | मैं भी कुछ कुछ वैसा ही हूँ , लौटते वक़्त कावेरी रेस्त्रां से खाना  पैक करवाते करवाते , कुछ ऐसा एहसास हुआ | ये ब्लॉग कावेरी में बिताये गए उस आधे घंटे के नाम है , ये ब्लॉग वेटिंग टाइम के नाम है , और एक शहर के नाम है | *********************************** बार बार किसी शहर में खुद की तलाश करते करते , कुछ कुछ अपना सा लगने लगता है शहर | शहर उम्मीदों से बनता है , और जिस शहर में आपकी उम्मीद पलती है , वही आपका अपना शहर बन जाता है | कॉफी डे की टेबलें , या आसामी चाय का स्वाद शहर के साथ नहीं बदलता |  ना ही मॉल के एस्कलेटर्स  बदलते हैं | अगर कुछ बदलता है , तो बदलता है शहर के साथ एक कशिश , एक अपनापन | हमने शहरों को बनाया है , अब शहरें हमें बनाती है | शहरें हमें सिखाती है , की ये जिंदगी का कौन सा मकां है , इस मकां के रिश्ते कितने नाजुक है | ये रिश्ते बस इंस्टाग्राम के स्क्रीन तक ही सिमित तो नहीं , इन रिश्तों में कितना वर्तमान है , और कितना भ...

एक आध तंज ऐ तमाचे पे रोया करते थे जार जार | |

बस की याद आता है वो स्कूली अफ़साने  कुमार एक आध तंज ऐ तमाचे पे रोया करते थे जार जार | | ********************************** अब की जिंदगी के दौड़ का  आलम ऐसा है जान जाती है , आँखों में नमी आती नहीं | | सारी तितलियाँ जिनके तलब दुपहरी गुजरती थी रोज़ नज़र आते हैं , लबों पे हंसी आती नहीं | | यूँ ही कभी बेवजह याद किया करो जाना तुम्हें याद आती नहीं , मुझे दिलकशी आती नहीं | | वो सारी लकीरें जो हमने  मिलकर खींची थी तुमने कभी गिना नहीं , मुझे गिनती आती नहीं | | कब तलक जिएंगे जख्म ऐ चारागरी की तलाश में रहम की गुंजाईश नहीं , मुझे विनती आती नहीं | |

याद आती है |

चलते चलते यूँ ही जब दम टूट जाता है तुम्हारे हाथों की मेहंदी कढ़ाई याद आती है | दुकानें बिखरी हैं सारी , कहीं अब जी नहीं लगता तुम्हारे शहर की मीठी ठंढाई याद आती है || सब कुछ ठीक ठाक होना ,इश्क़ में अच्छा नहीं लगता तुम्हारी पिछले बरस की रुसवाई याद आती है || एक शहर साथ चलता है , फिर भी अकेले हैं सारे शोर - शराबे में एक तन्हाई याद आती है || आसमां नीला है , टरक्वीज़ है या आसमानी है वो रंगों वाली तुम्हारी लड़ाई याद आती है ||

जब मिले थे हम ||

ये लोग बार बार पूछते है क्या बताऊँ कब मिले थे हम | ना किसी पहली बारिस की  इत्तेफ़ाक़ वाली रंगोली थी | ना कोई क्लास रूम था ना कोई आँख मिचौली थी | ना तुमने कभी किताबें गिराई ना मैंने कभी झुक कर उठाया | ना कोई ऐसी मंजिल थी जिसके रास्ते पे हम टकराये थे | बस एक नज़र ; दो चार लफ्ज़ ; और कुछ बुलबुल से खनकते बोल थे | मेरी लाजवाब ख़ामोशी थी जब मिले थे हम || 

बाबा

पुराने रिश्तों को वक़्त निकाल कर सीया करो बाबा इसी बहाने अपनी जवानी जिया करो बाबा || ये इतनी छोटी सी अँधेरी कोठरी है तेरी कभी तो रश्मियों से आँखें मिला लिया करो बाबा || कर देंगे हम ये जमीन तेरे नाम पे जब तक सांसें हैं , अदब से रोटी तो दिया करो बाबा || ये इश्क़ ये शायरी सब बेकार की बातें हैं दो वक़्त रोटी मिले ; कुछ ऐसा किया करो बाबा || जब तक जिंदगी है , तकल्लुफ औ जंग जारी है यूँ ही कभी दो बात पर , मुस्करा लिया करो बाबा || जो फ़िक्र को धुंए में उड़ा कर चलते हैं कभी उनकी जी हुजूरी में भी जिया करो बाबा || कोई हर वक़्त तुम्हारे दर्द पे " कोई बात नहीं " कहे किसी से इतनी भी उम्मीद  न किया करो बाबा || ये इश्क़ है , यहाँ फकीरी की भी एक हद होती है किसी का इतना भी वक़्त  न लिया करो बाबा || अभी तो जख्म की एक फेहरिश्त बाँकी है हर एक बात पे शराब  न पिया करो बाबा ||

डूबते सूरज को देखा है कभी |

setting sun By Sarang Yeola डूबते सूरज को देखा है कभी कितने खूबसूरत लगते हैं जब भी ये दिल उदास होता है | रश्मियों की आखिरी सांसें टूट रही हैं, रेशम के तांतों सी  उलझी खामोशियों का एक सिलसिला डूब रहा है | कुछ कुछ वैसा ही लगता हैं जैसा  पिछली बार लगा था जब बातों बातों में तुमने सीने से लगा लिया था | इश्क़ कुछ कुछ ऐसे ही उठता है अचानक इत्तेफ़ाक़ से : इश्क़ का कोई गवाह नहीं होता सिवाय "पोपकोर्न ट्रे और स्क्रीन पे चीखती सोनम कपूर....