ये लोग बार बार पूछते है
क्या बताऊँ
कब मिले थे हम |
ना किसी पहली बारिस की
इत्तेफ़ाक़ वाली रंगोली थी |
ना कोई क्लास रूम था
ना कोई आँख मिचौली थी |
ना तुमने कभी किताबें गिराई
ना मैंने कभी झुक कर उठाया |
ना कोई ऐसी मंजिल थी
जिसके रास्ते पे हम टकराये थे |
बस एक नज़र ;
दो चार लफ्ज़ ;
और कुछ बुलबुल से खनकते बोल थे |
मेरी लाजवाब ख़ामोशी थी
जब मिले थे हम ||
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