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वो मेरे नज़्मों का क्या होगा ?

वो जिसने कभी न  देखी समंदर
वो जिसने कभी ना रेत फांके
वो जो कभी नंगे बदन
दोपहर की सड़कों पर चला नहीं
वो मेरे नज़्मों  का  क्या होगा ?

वो एक सवेरा जिसके दूब पर
बची नहीं है ओस की बूंदें
वो एक क़स्बा जिसकी दुपहरी
बीती नहीं पीपल के तल्ले
वो सारे बूढ़े जिनकी आँखों में
इश्क़ इनायत , दुआ नहीं
वो मेरे नज़्मों  का  क्या होगा ?

वो जिसकी आँखों की रौशनी  में
पुराने जख्मों का सफर नहीं
वो जिसको अपनी बेनूरी की
दास्ताँ का  खबर नहीं
वो जिसके चेहरे पे दो एक चार
पिछले जंग का असर नहीं
वो जो वक़्त का हुआ नहीं
वो मेरे नज़्मों  का  क्या होगा ?

वो जो ख्वाइशों के सिलसिले में
रिश्तों से दूर भटक गया है
तरक्कियों की अट्टालिकाएं बनाये
वापस घर लौटा नहीं
वो जो अपनों का हुआ नहीं
वो मेरे नज़्मों  का  क्या होगा ?


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