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परछाईयाँ

तुम्हारे बेजुबान साये जब इस मोड़ से जाते हैं 
ठहर जाती है नज़र दो चार लम्हे के लिए 
उतर कर पटरियों से चला जाता हूँ
किनारे  किनारे  बिछे गिट्टियों पर |
एक्सीडेंट के खरासों को गिन गिन कर रातें कटती है |
साये बोलते नहीं ,
खैर इतने जख्म दे जाते हैं |

क्यों दे रखी है तुमने इसे
 बेफिक्र घूमने की आजादी 
अपने परछाईयों से लिपटकर क्यों नहीं सोती हो ?

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