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Diary Entry : 18th March

पूरे दिन  से लम्हा लम्हा चुरा कर 
उसने एक लेटर तैयार किया था|
लफ्ज़ -लफ्ज़ को माणी के माफिक 
कच्चे से धागे में पिरोया था |
नीचे फुटनोट में लिखा था : " धागे कच्चे हैं ,कमजोर नहीं |"

एक वक़्त के लिए तो लगा :
किसी ने एक पूरा कलेण्डर टांग दिया है लेटर में |
कुछ डेट्स पे एक लाल घेरा लगा के लिखा था
 " इस तारीख को बचा कर रखना , सेव द डेट "
कुछ डेट्स के किनारे किनारे महीन नन्हें से लफ्ज़ बुने थे 
"चलो ना चाँद का एक टुकड़ा तोड़ के तुम्हें खिलाएं "||

कहीं कहीं 
कुछ नीले स्याह कट के निशान थे 
कुछ खामोश से लफ्ज़ थे ; कोई पढ़ ना पाये |
कहीं कहीं 
एक दो नज़्म पिन किये गए थे ,
जंग (रस्ट ) के कुछ निशान आ गए थे 
शायद पिछली बारिस  की बात होगी |
लिखा था :
"जैसे  एक स्टेनलेस स्पून ,
छिटक के गिर गया हो हाथों से ;
तेरी मध्यान सी साँस ,अटक आयी है होठों पे ;
कब तक खींचता रहूँ ,मैं तारीखों में तुझे 
आ फलक से उतर कर मेरी जमीं पर तो आ ||"

कुछ कहानियों को पेस्ट करके 
लिफाफों में रख दिया था |
डेट डाल के लिख रखा था 
"कुछ सपनों के स्केच छिपे हैं अंदर ,
इन्हें सँवरने दो |"

पूरा लेटर तैयार था |
उसने सोचा 
इस कच्चे धागे में टँके लफ्ज़ को ,
स्क्रीन से जमीन पर उतारते हैं ;
एक प्रिंट आउट निकालते   हैं ||
............................................................

शाम को जब कमरे में वापस लौटा 
पलट कर टेबल से टकरा गया ,
लफ़्ज़ों के माणी माणी बिखर गए जमीं पर ;
खैर चुन चुन के तो रख लिए हैं ,जेब में उन्हें 
प्रिंट आउट अब फिर कभी |
अपने ही लफ़्ज़ों फंस  के रह गया था शायर ||

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