Skip to main content

Sunday poetry



1.  To Gulzar

तुम्हें देखते देखते मैंने 
कितनी रातें काटी है 
कितने लम्हें छीले हैं 
कितनी बातें काटी है |
ना है , ना होगा कभी  तुमसा कोई गुलज़ार ||

2. YAAD HAI US DIN

याद है उस दिन 
सलाखों पे हल्की हल्की बारिश ठहर रही थी |
थोड़े वक़्त के लिए ,रौशनी आयी थी इलाके में 
पड़ोस से टेलीविज़न की आवाज आ रही थी ;
शायद पहली बार 
हमनें कसमें उठायी थी , साथ मरने जीने की
आकर देखो 
वही सलाखें ,वही रौशनी ,वही रात पश्मीने की ||

Comments