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जाते जाते एक कसक छूट ही जाता है।।

घर कैसा भी हो दीवारों के दो चार टुकड़े सलाखों के चंद पल्ले ही सही जाते जाते एक कसक छोड़ ही जाता है । दो मंजिले पे आजकल कितने कबूतर आते हैं; दरवाजे के आलाव में कितनी आग ठहरती है चाय और सियासत के चर्चे में जीत किसकी होती है वो कौन है जो हर रोज़ शैर के वक़्त रोकता है ; बड़े अदब से पूछता है "सर ये रास्ता कहाँ तक जाता है? घर आखिर घर है,जाते जाते याद आता है। घर आखिर घर है मेरी रुसवाईयों का तकिया है , मेरे इश्क का रस्म है मेरा एक हिस्सा है , मैं इसका एक हिस्सा हूँ। सामने तुलसी के साथ उगते गुलाब की फीकी पड़ती चमक दूर दूर तक फैली सरसों की मासूम सी महक आम के कंधे पर तख़्त के झूले कोई आँख मूंदे ,हम छुप जाएँ कोई दौड़े , हमें छू ले  । जाते जाते एक कसक छूट ही जाता है।।

वो भी एक दौड़ था ।

वो भी एक दौड़ था । नींद में सपने देखा करता था। खिड़कियों के ग्रिल से चाँद ढूंढ़ता था। तसब्बुर का एक जाल बिछाता था; आसमां के कबूतरों को जमीं पड़ बुलाता था। हकीकतों में मरता था; ख्यालों में जीता था। इश्क में शायरी हुआ करती थी ; डूबे डूबे से लफ़्ज़ों में वो कहती थी "मेरे ख्वाबों के हमसफ़र कभी तो आया करो मेरे शहर । तुमसे बातें करते करते मैंने सारे तारे गिन लिये हैं।" ................ वो भी एक दौड़ था नींद में सपने देखा करता था। आज हकीकत सपने जैसे हो गये हैं। नींद आती नहीं; सपनों का तो सवाल ही नहीं उठता ।

Rohan

इस कमरे की खिड़की से  अब वो चाँद नज़र नहीं आता है। टुकड़ों टुकड़ों में बंटे सन्नाटे हैं , जैसे परिंदों के पर बाँध दिए हैं वक़्त ने। एक छोटा सा रोहन था। सामने छत पे बैडमिंटन खेलता रहता था। कहता था " साईना से शादी करेगा या फिर उसकी बेटी से ।" ठीक आठ बजे सड़क पे खड़ा हो जाता था ; दोनों तरफ देखता रहता था इंतजार : पता नहीं किधर से पेपर वेंडर आ जाये। खेल पृष्ठ निकाल लेता था और बांकी मुझे दे देता था । "आप सियासत पढ़ो भैया" कह कर खो जाता था 15-13, 15-12.... ब्लेड से कुछ तस्वीरें काटता और अपनी कॉपी में चिपकाता था। वो कॉपी एक रद्दी के शेल्फ पे पड़ा है। छत सर्द पड़ा है, ना कोई बैडमिंटन है , ना फीदर के बिखर जाने की कसक । पेपर वाला कब आता है किसी को खबर नहीं। ना कोई इंतजार है , ना जरुरत । अब कोई रोहन नहीं है। होस्टल में रहता है, और मैथ्स की कोचिंग लेता है। "उसे भी iitian बनना है" उसके डैड कहते हैं। उफ़, मैंने पागल कर दिया है सबको। अब कोई रोहन नहीं है। कोई रोहन बनना भी नहीं चाहता। किसी से रोहन बना भी नहीं जाता है। इस कमरे की खिड़की स...

AAPki Dilli

सुना आपने  एक माचिस तिल्ली को किसी ने चिंगारी दे दी । जल उठा। उन्होंने कहा  "वक़्त दो वक़्त में phosphorous जलेगा, फिर काठी जलेगी , और फैसला आते  आते राख बचेगा ।" और आज  मशाल बन के दौड़ रहा है  वो दिल्ली के गलियारों में । अहंकारों के राख बिछे हैं सड़कों पे ।। Victor Hugo said "Nothing is powerful as an idea whose time has come."

शायद सर्दी आ रही हैं ;

कुछ बात है  पानी की आखिरी घूँट की तरह  हलक पे अटक के रह गयी है |  लबों पे आने से डरती है | ख़ामोशी का धागा और दर्द की बिखरी मोतियाँ दोनों पड़े हैं टेबल पे ; कोई आये  इन्हें समेट कर एक तसब्बुर बनाये || कुछ बात है  भूले बिसरे रातों के टुकड़ों में लिपटा सा   जैसे ग्रेनाईट  का एक टुकड़ा  तुमने किसी नदी में उछाला हो ; अब ये कितना गहरा  जाएगा , किसे मालुम ! शायद कभी तह में दफ़न हो जाए ; शायद | कोई आये  दो लफ्ज़ कहे ; दो लफ्ज़ सुने  कोई सिलसिला चले | सिली सिली सी रातों की चुप्पी तो टूटे || कुछ बातें और भी हैं जैसे आजकल चाँद नहीं दिखता ; पता  नहीं  क्यूँ ? खिड़कियां बंद रहती हैं आज कल ; रूममेट को सर्द लग गयी हैं  | शायद | सितारे पहले फलक से उतर कर  गोद में बैठा करते थे ; आजकल वक़्त  नहीं मिलता | अब कोई बालकनी में हवा से बातें नहीं करता ; कमरे में रहते हैं , चुपचाप | शायद  सर्दी  आ रही  हैं ; शायद ||
A shear grief that I have swallowed by every passing minutes of late night ; A fire that I have felt coaxing my soul; Fear , insecurity and a glass of agony ; I have seen things roaming across the stars shining down from love to agony from agony to apathy from apathy to hatred from hatred to hostility from hostility to abhorrence . And love again with morning sunny rays yet grief sustains , fire sustains , fear sustains .

with love and prosperity a happy diwali