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खिड़कियां |

आज मैंने फैसला किया है
अपने घर की
सारी खिड़कियों को बंद करने का |

मेरी खिड़कियों से नजर आती हैं
कितनी सारी खिड़कियां
और हर एक में
कैद बैठी हैं कितनी सारी नज़्में
ये नज़्म इश्क़ का नहीं
ये नज़्म मुहब्बत का नहीं
ये सारी नज़्में हैं
हताशा और निराशा की
संघर्ष और तलाश की
जीवन और पलायन की
जो कहना मुझे आता नहीं |
इसीलिए
आज मैंने फैसला किया है
अपने घर की
सारी खिड़कियों को बंद करने का || 

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