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ख़ामोशी का चादर

हम हैं गुस्ताख़ 
बेफिक्र , फकीरी में जीने वाले 
हम चुप रहे , ये समझ जा सकता है 
वो फिक्रमंद 
मुहब्बत की सीपियों को चुनने वाले हैं 
वो चुप रहें , बड़ा भारी गुजरता है 

ये एक ख़ामोशी का चादर ;
रात के
कतरे कतरे ओस की बूंदों से
भारी होता चला जा रहा है |

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